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Art of Being Still

तुम क्या खुद को ख़ुदा समझते हो?

16 April 2021, 08:02 PM

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मेरे ख्वाहिशों की खिड़की

मेरे ख्वाहिशों की खिड़की

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मेरे ख्वाहिशों की खिड़की,

आज भी छोटी हैं।

खुली खिड़की से चांद

दिख सके रातों में।

उसके पास बैठे हम

तारों को गिन सके रातों में।।

 

मेरे ख्वाहिशों की खिड़की,

आज भी छोटी हैं।

सुबह सूरज की पहली

किरण अंदर झांक सकें।

सुबह की ताजी हवा

कमरे में अंदर आ सकें।।

 

मेरे ख्वाहिशों की खिड़की,

आज भी छोटी हैं।

सुबह की ताज़गी भरी शुरुआत

एक कप चाय के साथ।

तो शाम को दिनभर की

थकान को बांटती साथ।।

 

मेरे ख्वाहिशों की खिड़की,

आज भी छोटी हैं।

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Written by: Nidhi Kala. A Lecturer in college, Nidhi is a sensitive-to-nature-and-people kind of a person and in-closet poet.

 

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