भीड़ से
भड़क्के से
ज़िन्दगी के तेज़ घुमते चक्के से
थोड़ा थक चुकी थी मैं.
जाने कहाँ जाने की जल्दी थी मुझे
किस लिए कदमो को दौड़ाये
हाथों को सिमटाए,
दिल को सीने में दबाये
चले जा रही थी.
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मेरा दिल तो धड़कनों की आवाज़ में कह रहा था.
“ये जो
चलते, भागते,
तेज़ दौड़ते कदमो से
रोज़मर्रा के सदमे से
थोड़ा थक चुकी है तू.
थोड़ा रुक के यहीं सुस्ता ले.
ऐसा नहीं की बहुत दूर कहीं जाना है.
सांसें तो उतनी ही मिली हैं तुझे,
धड़कनें भी गिन के मिलीं हैं मुझे.
कहाँ जाने की जल्दी मचाई हैं?”

सांसें भी उखड़ीं,
धड़कनें भी उखड़ीं.
पर अभी रास्ता बहुत लम्बा था.
दूर अभी हैं मंज़िल इतनी, अचम्भा था.
दिल शायद रुक के सुस्ता भी लेता,
पर,
ख्वाब जो आँखों में जगा था सोने ना देता.
कदम यूँही बढ़ दिए राहों में.
छप गयी दूर खड़ी मंज़िल फिर निगाहों में.
सांसें फिर अपनी गति में आ गयी.
दिमाग पे फिर वही जुनूनीयत छा गयी.
क़दमों को थकान का एहसास भी ना हुआ.
दिल भी राहों की तरफ रुख़ था किया.
फिर एक बार राहों पे बढ़ चुकी थी मैं.
अब तो महसूस भी नहीं हुआ की थोड़ा थक चुकी थी मैं.

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ज़िन्दगी की राहें कईं लम्बे सफर में ले जाती हैं हमें. कईं बार इन्ही लम्बी राहों पे यूँही कुछ थकान भी महसूस होती हैं. पर अगर उसी वक्त हम अपनी मंज़िल की ओर देख लेते हैं, तो वो दूर खड़ी मंज़िल नयी शक्ति दे देती हैं आगे बढ़ने के लिए, और हमें याद भी नहीं रहता की हम थोड़ा थक चुके थे.

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Love,

Lipi Gupta

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Copyright: Lipi Gupta,07/06/2018, 17:00 PM IST

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