यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।”

अर्थात जहाँ नारियों की पूजा होती है,ईश्वर वहां निवास करते है।

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भारतीय समाज की पहली सीख। सबसे आदर्श और सभ्य संस्कृति जहाँ नारी को भी दुर्गा के रूप में शक्ति का प्रतिक मानकर पूजा जाता है। जहां माँ का स्थान पिता से अधिक माना जाता है, देवी सरस्वती को ज्ञान का प्रतिक माना जाता है और धन की देवी के रूप में माँ लक्ष्मी की पूजा की जाती है। एकमात्र भारतीय सभ्यता ही है जहाँ हम नारी को देवी का दर्जा देते है।

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लेकिन सब मात्र ढोंग बनकर रह गया है, मैं स्वयं इसी समाज का हिस्सा हूँ और यह कहते हुए बेहद पीड़ा होती है कि हमारा समाज आज हवस की आग में जलकर मर चुका है। अब शायद इंसान नज़र ही नही आते कही, अगर कुछ बचा है तो एक घिनौनी और घटिया मानसिकता और हैवानों की बस्तियां।

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कुछ दिनों पहले मंदसौर में एक 7साल की मासूम के साथ एक युवक ने बलात्कार किया, मंदसौर की जनता में काफी गुस्सा था और पुलिस प्रशासन ने भी आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। उसके बाद हाल ही में एक 3साल की मासूम के साथ जयपुर में हैवानियत हुई। 3साल की बच्ची के प्रति यह गलत सोच आती भी कैसे है? क्या 3 साल में उसके वक्षों का उभार बढ़ जाता है? या जीन्स या मिनी-स्कर्ट पहने हुए वो कामदेवी नजर आने लगती है? एक 3साल की मासूम के लिये यह सब लिखना या बोलना मुझे भी शर्मिंदा करता है, लेकिन मैं इन बलात्कारियों की मानसिकता जानना चाहता हूँ।

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इसी साल बहुचर्चित कठुआ रैप कांड हुआ, पुरे देश में इसके लिये गुस्सा था, सरकार ने भी पॉस्को एक्ट में बदलाव किये। लगने लगा था कि शायद यह बदलाव की शुरआत होगी।

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लेकिन उसके बाद भी बलात्कारों का सिलसिला थमता ही नही, हर दिन सुबह का अखबार किसी न किसी शहर में हुई बलात्कार की वारदात के साथ दरवाजो पर दस्तक देता है। 3 साल, 7साल, 8साल, 12 साल ये उम्र होती है जब हम समाज के साथ सामंजस्य बनाना शुरू करते है, समाज का अर्थ, रिश्तों की अहमियत इस सब की समझ धीरे- धीरे हमे होने लगती है। तब हर रिश्ता हमारे लिये खास होता है, क्योकि उस वक़्त हमारे मासूम और कोमल हृदय को रिश्तेदारों और समाज के घिनोनेपन की  समझ नही होती है। अगर इस कच्ची उम्र में उनके साथ कोई दुष्कृत्य हो जाता है तो क्या हम सोच भी सकते है कि उनके कोमल मन पर इसका क्या असर होगा?

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पॉस्को एक्ट में बदलाव वर्तमान सरकार का एक सराहनीय कदम है, लेकिन इस पर अमल कब होगा? कब पहले दरिंदे को फाँसी दी जाएगी? और क्या ये फाँसी उन कोमल मन में समाये हुए खौफ को कभी खत्म कर पाएगी? क्या फिर कोई दिव्या, संस्कृति, गीता या आसिफा उसी मासूमियत से मुस्कुरा पाएगी? हम सब जानते है कि ऐसा फिर कभी नही होगा। वो किसी अँधेरे कमरे की चार दिवारी में खुद को कैद कर लेंगी, और फिर उनकी तरफ बढ़ता हुआ हर साया उन्हें डराएगा, फिर चाहे वो साया उनके पिता का ही क्यों न हो? उन्हें हर वक़्त ये डर सताएगा की कोई है जो उनकी तरफ बढ़ रहा है उनके बदन को नोंचने के लिये, एक कभी न भरने वाला जख्म देने के लिये। लेकिन फिर भी अगर तुम्हे अपनी हवस की आग में उन मासूमो की पीड़ा का एहसास नही होता तो तुम इंसान कहने का हक़ खो चुके हो, मैं तुम्हे सिर्फ हैवान और वहशी दरिंदा ही कहूंगा। और हमारा समाज जो इन वहशियों को पनाह देता है, अगर इन्साफ नही दिला सकता, या सुरक्षा नही कर सकता इन दरिंदो से अपनी बहन-बेटियों की तो बन्द करे फिर देवी बनाकर नारी को पूजने का स्वांग। जब अपने ही समाज में नारी की इज़्ज़त का तमाशा बन रहा है हर दिन, तो किसी दुर्गा की पूजा से क्या पा लोगे तुम?

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फिर सभ्यता और संस्कृति का झूठा स्वांग क्यों, जब की आपकी वासना हर दिन उसी संस्कृति का सरे बाजार बलात्कार करती है।बन्द करो अब से हमे ये सीखना
की…. “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।”

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लेखक परिचय;- नितिन, 23, राजस्थान के डूंगरपुर जिले से है। अनछुए पहलुओं पर लिखना और उन्हें समाज के सामने लाना नितिन के लेखन का मूल उद्देश्य है।

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उदयपुर के एक निजी इंस्टिट्यूट से नर्सिंग में डिप्लोमा करने के बाद नितिन ने लेखन की तरफ अपना पहला कदम बढ़ाया और वर्ष 2017 में उनकी पहली पुस्तक प्रकाशित हुई। और तबसे उनकी दो पुस्तकें अंग्रेजी में और एक कविता संग्रह हिंदी में प्रकाशित हुए है, जिनके लिए उन्हें भरपूर सरहहना मिल रही है।

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KHUL JA SIM SIM !!!! These are the magical words that are to be used to enter the magical realm...

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