मशहूर सा किस्सा…

डर और बेचैनी का अजीब सा एहसास था मन में, 69वर्ष के जीवन में पहली बार वह शहर की इस तेज-तर्रार जिंदगी में कदम रखने वाले थे। पत्नी के गुजरने के बाद अब एकलौता बेटा ही उनका अंतिम सहारा था, और बेटा भी इस बात को भलीभांति समझता था, इसीलिये तो ट्रैन की टिकट भेजकर उसने पिता को शहर बुला लिया।

स्टेशन पर उतरते ही बूढ़ी आँखे अपने बेटे को ढूंढने लगी, उसने बोला तो था कि वो स्टेशन लेने आएगा। नही आया, शायद किसी काम में अटक गया होगा। कुछ देर इंतज़ार कर लूँ, शायद आता ही होगा।

इंतज़ार करते हुए 2 घंटे गुजर गए, लेकिन बेटा नही आया। तभी पिता को ख्याल आया की बेटे ने टिकट के साथ एक चिट्ठी भी तो भेजी थी, शायद उसमे पता लिखा हो। लेकिन पिता की मजबूरी थी की वो ज्यादा पढ़े-लिखे नही थे, अंग्रेजी में लिखे पते को कैसे पढ़ते। वह पास ही के एक रिक्शा वाले के पास गए और चिट्टी उसे थमा दी, “बेटा, इस पते पर पहुंचा दोगे?”

रिक्शा वाले ने चिट्ठी पढ़ी और बुजुर्ग की तरफ देखकर बोला, “चाचा, गाँव से आए हो अपने बेटे से मिलने?”

बुजुर्ग की आँखे चमक उठी, शायद यह रिक्शा वाला उनके बेटे को पहचानता हो, “हां, क्या मेरे बेटे ने इसमें यह भी लिखा है?”

रिक्शे वाले ने चिट्ठी पुनः बुजुर्ग के हाथों में थमा दी और दुखी मन से बोला, “इसमें वृद्धाश्रम का पता लिखा है।”

भारी मन से बुजुर्ग वही सड़क पर बैठ गया, वह परिस्थितियों को समझ चुका था लेकिन फिर भी एक पिता का मन था जो अभी भी नही मान रहा था कि उसकी अपनी संतान उसके साथ ऐसा कुछ करेगी।

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बड़ा मशहूर सा किस्सा है यह,जिसे कभी न कभी हम सभी सुन चुके है। हम भारतीय समाज का हिस्सा है, बुजुर्गों के लिये सम्मान,आदर यही हमारी संस्कृति है, और यही संस्कृति हमे विश्व में एक अलग पहचान दिलाती है। लेकिन अफ़सोस की बदलते समय के साथ हम बदलने लगे है, आधुनिकता के दिखावे में हम अपनी संस्कृति भूलते जा रहे है। जो माता-पिता हमारे जीवन का आधार है, हम उन्ही से दूर होते जा रहे है। उम्र के जिस पड़ाव पर उन्हें सबसे अधिक हमारी जरूरत होती है, उस वक़्त ही हम उन्हें तड़पने के लिये अकेला छोड़ देते है।

स्वामीनाथ पांडेय जी की कुछ पंक्तियां याद आती है, जो आधुनिक समाज की उन संतानों के गालों पर तमाचा है, जो माँ-बाप को बोझ समझते है…

“एक विधवा माँ थी, उसके 2 बेटे थे। एक बेटा ऊपर वाले माले पर रहता था, दूसरा बेटा नीचे वाले माले पर रहता था। विधवा माँ 15  दिन एक बेटे के यहां खाना खाती थी, विधवा माँ 15 दिन दूसरे बेटे के यहां खाना खाती थी। लेकिन ये उस विधवा माँ का दुर्भाग्य था कि साल में जो-जो महीने 31 दिन के होते, उस 1 दिन माँ को उपवास करना पड़ता था।”

यह सच में दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति है, की हमारे लिये एकल परिवार स्वतंत्रता का पर्याय बन गया है, और अपने निजी स्वार्थ में अपने बुजुर्गों की तकलीफों का कारण बन रहे है। जो माता- पिता हमारे जीवन के निर्माण में अपने निजी जीवन के कई अहम वर्ष बर्बाद कर देते है, हम उन्ही की जिम्मेदारी लेने में हिचकिचाते है। यह वो पाप है जिसे आधुनिक समाज पाप की श्रेणी में नही गिनता, लेकिन पाप तो पाप है। युवा पीढ़ी भूल जाती है कि उनकी भी एक संतान है, कल वो भी बूढ़े हो रहे है।

भारतीय संविधान में बुजुर्ग पर होने वाले अत्याचारों को रोकने के लिए कानून भी बनाये गए है, मैं कुछ को यहाँ लिख रहा हूँ:

  •  संतान अपने माता-पिता की संपत्ति पर गैरकानूनी रूप से कब्ज़ा नहीं कर सकती है, यह दंडनीय अपराध होगा और उनकी देखभाल ना करने पर उन्हें तीन माह की कैद तथा 5000 रूपये जुर्माना देना होगा ।
  •  ऐसी परिस्थिति में जब वरिष्ठ नागरिक अपनी संपत्ति अपने उत्तराधिकारी के नाम कर चूके है पर इस शर्त पर क़ि वह उसकी आर्थिक एवं शारीरिक जरूरतों का भरण पोषण करें । यदि संपत्ति का अधिकारी ऐसा नहीं करता है तो वह माता पिता या वरिष्ठ नागरिक अपनी संपत्ति वापस ले सकता है ।
  •  सरकार ने यह आदेश दिया है की प्रत्येक राज्य के हर जिले में कम से कम एक वृद्धाश्रम हो ताकि वह वरिष्ठ नागरिक जिनका कोई नहीं है उनका रखरखाव बेहतर तरीके से वृद्धाश्रम में हो सके ।

 

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लेखक परिचय;- नितिन, 23, राजस्थान के डूंगरपुर जिले से है। अनछुए पहलुओं पर लिखना और उन्हें समाज के सामने लाना नितिन के लेखन का मूल उद्देश्य है।

उदयपुर के एक निजी इंस्टिट्यूट से नर्सिंग में डिप्लोमा करने के बाद नितिन ने लेखन की तरफ अपना पहला कदम बढ़ाया और वर्ष 2017 में उनकी पहली पुस्तक प्रकाशित हुई। और तबसे उनकी दो पुस्तकें अंग्रेजी में और एक कविता संग्रह हिंदी में प्रकाशित हुए है, जिनके लिए उन्हें भरपूर सरहहना मिल रही है।

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